:एक में दो व्यक्ति:

:एक में दो व्यक्ति:
एक व्यक्ति में
दो व्यक्ति वास करते हैं
एक अंदर और
एक बाहर
पर दोनों संतुलन
बनाये हुए हैं
जब भीतर का व्यक्ति
उद्वेलित होता है
तो बाहर का व्यक्ति
शांत होता है और जब
बाहर का व्यक्ति
उद्वेलित होता है
तो फिर भीतर का व्यक्ति
शांत होता है
अगर दोनों व्यक्ति
एक हो जाएं तो
या तो स्थिति विस्फोटक
हो सकती है
या फिर बिल्कुल शांत
और ये दोनों स्थितियां
बेहतर कर्मशील
जीवन के लिए
अच्छी नही
इसलिए प्रकृति ने
जो संतुलन बनाया है
यही विचित्र संतुलन
जीवन की गतिशीलता है
जो बेहतर सोच के साथ
जीवन को आगे बढ़ाती है
तभी जीवन ,जीवन है !
©अश्विनी रमेश।

उर्मिला

बहुत अधिक करती रही
प्रेम उर्मिला
इसीलिए करती रही वह
सम्मान
पति की इच्छाओं का
भले ही त्यागने पड़े
इसके लिए उसे
वे सारे सपने,
सारे सुख
जो स्त्री होने से पूर्व देखती है
एक लड़की
और होती है खुश
इन सब के बावजूद
उसने नहीं की कभी भी
शिकायत
न राजा से न पति
बल्कि स्वीकार किया उसने
एक अज्ञातवास,
उसने सहा एक ऐसा
संत्रास
जिसकी वह हकदार भी न थी
क्योंकि वह एक स्त्री थी
जिसका वजूद उसके
स्त्रीत्व में समाया था
वह सीता जैसे
नही फूंक सकी
विद्रोह का बिगुल
न ही परिचित करा सकी
संसार को
अपनी गहन पीड़ा से
उसके भावों को समझने मे
असफल रहे बाल्मीकि
और असफल रहे
तुलसी बाबा
और असफल रहा
आज का विशिष्ट कवि भी
कारण साफ था
क्योंकि सभी के थे अपने अपने
ध्येय
और अपने अपने मंतव्य
इसीलिए आज भी उपेक्षित है
उर्मिला
और पूज्य है
विद्रोह की हुंकार भरने वाली
सीता
क्योकि अत्यधिक समर्पित
प्रेमिकाएं और पत्नियाँ
स्थापित नहीं कर सकती
प्रेम की नवपरिभाषाएं
नाही गढ सकती हैं
प्रेम के प्रेमत्व को
ठीक समय बताती
हाथ में बंधी घड़ी सी
जो नहीं पकड़ पाती
बीते हुए लम्हे

किताबें: कविता: दिनेश शर्मा

किताबें

ये हमारे अनुभवों के चेहरें हैं
उपलब्धियों के दर्पण

ज्ञान के सागर की इन लहरों में ही
छुपे हैं पुरखों की हस्तियों के सूरज

हर पन्ने पर उदीप्त यहां
नये दिन की रौशनी

अक्षरों के जुगनुओं ने
संघर्ष की टिमटिमाहट से
उकेरे सुख-दुःख के चित्र

चीटियों से कतारबद्ध शब्दों ने
बनाई जो राहें
चलते उन्हीं पर सधे कदम
पार करते हम
सभ्यता की प्रगति के मील पत्थर

गुंजायमान यहां एक आत्मध्वनि
कि जानो और जियो
जियो और दर्ज करो जीवन।

दिनेश शर्मा
18-04-17

:अंतर : कविता

जय देवता जदराई ,जय देवता चिखड़ेश्वर
इस धरा पर अगर मानवीय संबधों की बात की जाए तो मेरे जीवन में ,मैं जो कुछ भी हूँ उसके लिए मेरी स्वर्गीय पूजनीय मां का योगदान और स्थान सबसे ऊपर है। अतः मां के लिए समर्पित यह कविता जो मेरे काव्य संकलन में प्रकाशित है ,को इस वेबसाइट की पहली रचना के रूप में प्रकाशित कर रहा हूँ :
-अन्तर—-
माँ !
तुम बांध क्योँ नहीं लेती
सत्तू
छाछ
जौ और कुकडी*के
पकवानों की यादों की पोटली
मैं आज गांव छोड़कर
शहर जा रहा हूँ
वह सब देखने
जो मैंने
यहां नहीं देखा
वह सब करने
जो मैंने
यहां नहीं किया
और
वह सब पाने और भोगने
जो यहां नहीं पाया और भोगा
या इससे भी बढकर
शायद अपनी अस्मिता की तलाश में
क्योंकि
आज
मेरी इच्छाएं और विवशताएं
एक होकर
मुझे
यहां से
दूर ले जाना चाहतीं हैं
और
अब तुमसे
बगावत करने के अतिरिक्त
मुझे कोई दूसरा रास्ता
दिखाई ही नहीं देता
यह जानते हुए भी कि
मुझे एक न एक दिन
वापस गांव तो
लोटना ही होगा
लेकिन तब तुम नहीं होगी
और मेरे लिए
गांव या शहर में
तब
केवल थोड़ा सा ही
अन्तर रह जाएगा
शब्दों का
‘गांव’
और
‘शहर’
———–
१.कुकडी*- अर्थ-मक्की !
                                             (प्रस्तुत कविता, मेरे काव्य-संग्रह-“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द से उद्धृत की गयी है-अश्विनी रमेश )