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:अंतर : कविता

जय देवता जदराई ,जय देवता चिखड़ेश्वर
इस धरा पर अगर मानवीय संबधों की बात की जाए तो मेरे जीवन में ,मैं जो कुछ भी हूँ उसके लिए मेरी स्वर्गीय पूजनीय मां का योगदान और स्थान सबसे ऊपर है। अतः मां के लिए समर्पित यह कविता जो मेरे काव्य संकलन में प्रकाशित है ,को इस वेबसाइट की पहली रचना के रूप में प्रकाशित कर रहा हूँ :
-अन्तर—-
माँ !
तुम बांध क्योँ नहीं लेती
सत्तू
छाछ
जौ और कुकडी*के
पकवानों की यादों की पोटली
मैं आज गांव छोड़कर
शहर जा रहा हूँ
वह सब देखने
जो मैंने
यहां नहीं देखा
वह सब करने
जो मैंने
यहां नहीं किया
और
वह सब पाने और भोगने
जो यहां नहीं पाया और भोगा
या इससे भी बढकर
शायद अपनी अस्मिता की तलाश में
क्योंकि
आज
मेरी इच्छाएं और विवशताएं
एक होकर
मुझे
यहां से
दूर ले जाना चाहतीं हैं
और
अब तुमसे
बगावत करने के अतिरिक्त
मुझे कोई दूसरा रास्ता
दिखाई ही नहीं देता
यह जानते हुए भी कि
मुझे एक न एक दिन
वापस गांव तो
लोटना ही होगा
लेकिन तब तुम नहीं होगी
और मेरे लिए
गांव या शहर में
तब
केवल थोड़ा सा ही
अन्तर रह जाएगा
शब्दों का
‘गांव’
और
‘शहर’
———–
१.कुकडी*- अर्थ-मक्की !
                                             (प्रस्तुत कविता, मेरे काव्य-संग्रह-“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द से उद्धृत की गयी है-अश्विनी रमेश )

 

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