:एक में दो व्यक्ति:

:एक में दो व्यक्ति:
एक व्यक्ति में
दो व्यक्ति वास करते हैं
एक अंदर और
एक बाहर
पर दोनों संतुलन
बनाये हुए हैं
जब भीतर का व्यक्ति
उद्वेलित होता है
तो बाहर का व्यक्ति
शांत होता है और जब
बाहर का व्यक्ति
उद्वेलित होता है
तो फिर भीतर का व्यक्ति
शांत होता है
अगर दोनों व्यक्ति
एक हो जाएं तो
या तो स्थिति विस्फोटक
हो सकती है
या फिर बिल्कुल शांत
और ये दोनों स्थितियां
बेहतर कर्मशील
जीवन के लिए
अच्छी नही
इसलिए प्रकृति ने
जो संतुलन बनाया है
यही विचित्र संतुलन
जीवन की गतिशीलता है
जो बेहतर सोच के साथ
जीवन को आगे बढ़ाती है
तभी जीवन ,जीवन है !
©अश्विनी रमेश।

– बदलना –

मित्रो, बदलाव प्रकृति का नियम है परंतु कभी हम किसी स्थान या व्यक्ति के साथ ऐसे जुड़ जाते हैं कि उस व्यक्ति और स्थान से दूराव हमें कष्ट और दुःख देता है पर समय और परिस्थितिवश हमें बदलना पड़ता है यानि स्थान, व्यक्ति से भी दूराव हो सकता है जिस परिस्थिति को समझकर दुख और कष्ट को कम किया जा सकता है और एक समय बीतने के बाद खत्म भी क्योंकि ये ठीक कहा गया है कि “Time is a great healer” .
कई बार हम व्यवहार और आदतों आदि में बदलाव पर भी कटाक्ष करते हैं जैसे मसलन एक गाने के बोल हैं ‘बदले बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं”इस गाने के बोल में बदले हुए व्यवहार की तरफ इशारा किया गया है । हम ऐसा भी कई बार कह देते हैं कि उसने पासा बदल दिया एक ग्रुप से या किसी एक विचार विशेष से वो किसी दूसरे ग्रुप या विचार विशेष की और चला गया। लोग यों भी कह देते हैं “यार अब वो बदल गया है या बहुत बदल गया है। “यहां बदलने का अर्थ एक व्यक्ति के व्यवहार बदलने से होता है । कई बार व्यक्ति व्यस्त होता है या उलझा हुआ होता है फिर भी कुछ लोग कह देते हैं “अब ये बहुत बदल गया है” ये सारे मतलब व्यवहार बदलने से होते हैं । अब सवाल आता है कि क्या बदलना चाहिए? यदि हाँ तो कितना बदलना चाहिए । इसका उत्तर कोई बहुत जटिल तो नहीं पर समझकर जीवन में अपनाने की ज़रूरत है । स्थान,समय और परिस्थितियों अनुसार बदलना कोई बुरी बात नहीं पर एक बात है जो आपमें नहीं बदलनी चाहिए ,वह है ,आपकी ईमानदार नियत ।आपकी ईमानदार नियत एक जीवन मूल्य है जो किसी परिस्थिति,समय स्थान में नहीं बदलना चाहिए । जिस तरह प्रकृति के नियम नहीं रूप बदलते हैं उसी तरह तुम्हारे भी रूप बदले तो कोई फर्क नहीं मगर नियत नहीं बदलनी चाहिए । यदि ईमानदार व्यक्तियों में ईमानदारी की नीयत बदलती है तो फिर समाज में असंतुलन पैदा होने का खतरा बढ़ेगा क्योंकि जहां बुराई है वहां अच्छाई का होना ज़रूरी हो जाता है तभी संतुलन कायम रह सकता है समाज में ।इसलिए जो भी करो या जितना भी बदलो ,बदल सकते हो पर अपनी नियत में ईमानदारी रखना फिर बदलकर भी तुम नहीं बदलोगे और अपनी मर्यादा पर कायम रह सकोगे ।
©अश्विनी रमेश।

उर्मिला

बहुत अधिक करती रही
प्रेम उर्मिला
इसीलिए करती रही वह
सम्मान
पति की इच्छाओं का
भले ही त्यागने पड़े
इसके लिए उसे
वे सारे सपने,
सारे सुख
जो स्त्री होने से पूर्व देखती है
एक लड़की
और होती है खुश
इन सब के बावजूद
उसने नहीं की कभी भी
शिकायत
न राजा से न पति
बल्कि स्वीकार किया उसने
एक अज्ञातवास,
उसने सहा एक ऐसा
संत्रास
जिसकी वह हकदार भी न थी
क्योंकि वह एक स्त्री थी
जिसका वजूद उसके
स्त्रीत्व में समाया था
वह सीता जैसे
नही फूंक सकी
विद्रोह का बिगुल
न ही परिचित करा सकी
संसार को
अपनी गहन पीड़ा से
उसके भावों को समझने मे
असफल रहे बाल्मीकि
और असफल रहे
तुलसी बाबा
और असफल रहा
आज का विशिष्ट कवि भी
कारण साफ था
क्योंकि सभी के थे अपने अपने
ध्येय
और अपने अपने मंतव्य
इसीलिए आज भी उपेक्षित है
उर्मिला
और पूज्य है
विद्रोह की हुंकार भरने वाली
सीता
क्योकि अत्यधिक समर्पित
प्रेमिकाएं और पत्नियाँ
स्थापित नहीं कर सकती
प्रेम की नवपरिभाषाएं
नाही गढ सकती हैं
प्रेम के प्रेमत्व को
ठीक समय बताती
हाथ में बंधी घड़ी सी
जो नहीं पकड़ पाती
बीते हुए लम्हे

विचारणीय औऱ अनुकरणीय-1

किसी का कहा हुआ “It is never late”यानी किसी भी कार्य को कभी भी शुरू किया जा सकता है ” ये ऐसा वाक्य है जो निष्प्राण में यानी बिल्कुल निराश व्यक्ति में भी किसी कार्य को करने की प्रेरणा फूंक सकता है ,जिस कार्य को वह यह समझता है कि अब वह यह कार्य नहीं कर पायेगा । कभी किसी काम को ये नहीं सोचना चाहिए कि ये मैं नहीं कर पाऊंगा । हमेशा सीखने की दिलचस्पी,नियत और एटीटूड होना चाहिए । जीवन में ‘सतत प्रयास’ का पॉजिटिव विचार और उसका कार्यान्वयन जीवन को बेहतर बनाता है ।
©अश्विनी रमेश ।

किताबें: कविता: दिनेश शर्मा

किताबें

ये हमारे अनुभवों के चेहरें हैं
उपलब्धियों के दर्पण

ज्ञान के सागर की इन लहरों में ही
छुपे हैं पुरखों की हस्तियों के सूरज

हर पन्ने पर उदीप्त यहां
नये दिन की रौशनी

अक्षरों के जुगनुओं ने
संघर्ष की टिमटिमाहट से
उकेरे सुख-दुःख के चित्र

चीटियों से कतारबद्ध शब्दों ने
बनाई जो राहें
चलते उन्हीं पर सधे कदम
पार करते हम
सभ्यता की प्रगति के मील पत्थर

गुंजायमान यहां एक आत्मध्वनि
कि जानो और जियो
जियो और दर्ज करो जीवन।

दिनेश शर्मा
18-04-17

:अंतर : कविता

जय देवता जदराई ,जय देवता चिखड़ेश्वर
इस धरा पर अगर मानवीय संबधों की बात की जाए तो मेरे जीवन में ,मैं जो कुछ भी हूँ उसके लिए मेरी स्वर्गीय पूजनीय मां का योगदान और स्थान सबसे ऊपर है। अतः मां के लिए समर्पित यह कविता जो मेरे काव्य संकलन में प्रकाशित है ,को इस वेबसाइट की पहली रचना के रूप में प्रकाशित कर रहा हूँ :
-अन्तर—-
माँ !
तुम बांध क्योँ नहीं लेती
सत्तू
छाछ
जौ और कुकडी*के
पकवानों की यादों की पोटली
मैं आज गांव छोड़कर
शहर जा रहा हूँ
वह सब देखने
जो मैंने
यहां नहीं देखा
वह सब करने
जो मैंने
यहां नहीं किया
और
वह सब पाने और भोगने
जो यहां नहीं पाया और भोगा
या इससे भी बढकर
शायद अपनी अस्मिता की तलाश में
क्योंकि
आज
मेरी इच्छाएं और विवशताएं
एक होकर
मुझे
यहां से
दूर ले जाना चाहतीं हैं
और
अब तुमसे
बगावत करने के अतिरिक्त
मुझे कोई दूसरा रास्ता
दिखाई ही नहीं देता
यह जानते हुए भी कि
मुझे एक न एक दिन
वापस गांव तो
लोटना ही होगा
लेकिन तब तुम नहीं होगी
और मेरे लिए
गांव या शहर में
तब
केवल थोड़ा सा ही
अन्तर रह जाएगा
शब्दों का
‘गांव’
और
‘शहर’
———–
१.कुकडी*- अर्थ-मक्की !
                                             (प्रस्तुत कविता, मेरे काव्य-संग्रह-“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द से उद्धृत की गयी है-अश्विनी रमेश )

 

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